थोदा सा गरज़ है, थोदि सि समज है
चाहतों के दायेरे में, रुखना फ़रज़ है
कोइ केहता है, कि घर आगया है
आरज़ूं भि अरज़ है, के बदथे जाना

इनके लिये अब तक चले, हज़रो में हम भि मिले.

- लक्की अलि, सिफ़र